हमारी हकीकत हमे ही पता है, लोगों ने इस चेहरे को बस हसते हुए देखा है...

शेर को पालने में उतना खर्चा नहीं है जितना मेकअप और पब्लिसिटी कर सियार को लगातार शेर के रूप में प्रस्तुत करने में है।

वो मस्जिद गया मन्दिर भी गया और गया समुद्र के बीच….. लेकिन रहा फिर भी नीच का नीच

कर्ज़ उतर जाता है एहसान नहीं उतरता।

राम तुम्हारे युग का रावन अच्छा था... दस के दस चेहरे सब बाहर रखता था... प्रताप सोमवंशी

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