तोड़ कर मैं सारे बंधन,परिंदा हो जाऊँजी चाहता है फ़िर से, मैं ज़िन्दा हो जाऊँ

आंधियों को आख़िर ज़िद छोड़ना पड़ादम उनका निकाल दिया इक चराग़ ने

ये तो बस हम ही जानते हैं उम्र कैसे गुज़ारी है,बगैर तेरे गुज़रता लम्हा आख़िर कितना भारी है

धूप तो धूप है इसकी शिकायत कैसीअबकी बरसात में कुछ पेड़ लगाना साहब ~ निदा फ़ाज़ली

वो गालियाँ देकर अघाता नहींसंस्कार मेरा भी जाता नहीं

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