शहर से अच्छा तो अपना गाँव है,
जहाँ हम मकान नम्बर से नहीं
‘पिता’ के नाम से पहचाने जाते हैं.
जिसके जाने से जान जाती थी
उसको मैंने खुद Block किया है
‘’शोक मत करो ! नहीं उतरेगा कोई भी उत्सव
बुलावे पर उनके लाल क़ालीनों पर
करेंगे सारे उत्सव प्रतीक्षा
न्योते की तुम्हारे रोककर साँसें अपनी
बस करना होगा थोड़ा सा इंतज़ार”
गांव बदलकर शहर हो रहे हैं,
और इंसान बदलकर जहर हो रहे हैं…
समझदार इंसान वही है जिसे पता है
कब और कहाँ कितना
बेवक़ूफ़,
मासूम और असहाय दिखना है