मेरा धर्म बड़ा इस दंभ मे गला अपनो का रेत रहे,पहले मकां थे जो इंसान वो अब केवल खेत रहे,
शमसीर सी वाणी दिल मे नफरत कि आग है,कैसे रौशन होगा गुल यहा हर इंसान नाग है,
और अपने स्वार्थ मे निर्दोषो...
जिंदगी अपने रफ्तार से चल रही हैं, हम अपनी रफ्तार से चल रहे हैं, और समय........? वो तो बस मजे लिए जा रहा हैं।
प्रेम सदा माफ़ी मांगना पसंद करता है, और अहंकार सदा माफ़ी सुनना ..!!!
जब किसान के बेटे को गोबर में बदबू आने लग जाए तो समझ लो कि देश मे अकाल पड़ने वाला है। ~ प्रेमचंद
तेरे वास्ते फ़लक से मैं चाँद लाऊँगा, सोलह सत्रह सितारे संग बांध लाऊँगा"पर कच्छा खुद नही धोऊँगा.