पर्दे अच्छे, कम से कम बातें छनकर तो आती हैंदीवारों का क्या है.. वो तो आवाज़ें खा जाती हैं !!

मेरे ज़ख्मों को उसने तब और ताजा कर दिया,जब उसने मेरे दोस्त से निकाह का वादा कर दिया..!!

अरमान सिर्फ उतने ही अच्छे है जहाँ, स्वाभिमान गिरवी रखने की जरूरत ही ना पड़े…!!

गहने, झुमके, कंगन के बिना भी मैं तुम्हें सजा सकता हूं मैं शायर हूं, अपने लफ़्ज़ों से ही तुम्हें दुल्हन बना सकता हूं

प्रेम तो आज भी उसी रुप उसी मिठास में है बस उसे निभाने वाला मनुष्य ही अधिक समझदार हो गया है। राजेश गौरी

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