दर्पण देख सँवर गए कितने
अपने पर ही मर गए कितने
ख़्वाबों की खेती को सच के
कीट-पतंगे चर गए कितने
प्यार वफ़ा ईमान की बातें
करके लोग मुकर गए कितने
फ़ाइलें सब्ज़ योजनाओं की
चूहे रोज़ कुतर गए कितने...
किसी से क्या शिकायत करते साहब ,
दिल लगाने की खता तो हमनें भी की..!!
वक्त निकल जाने के बाद जो कद्र होती है,
वो कद्र नहीं अफसोस होता है...
मेरी बेचैनियों का तुम यूँ हिसाब रखना,
कि हर हिचकी पर तुम एक गुलाब रखना।
सफ़र छोटा ही सही यादगार होना चाहिए ,
रंग सांवला ही सही वफादार होना चाहिए।।