कविता गाकर रिझाने के लिए नहीं समझ कर खो जाने के लिए है। रामधारी सिंह दिनकर

अंदर का ज़हर चूम लिया धुल के आ गए, कितने शरीफ़ लोग थे सब खुल के आ गए.

चालाकी, चतुराई और बेशर्मी के मिश्रण को आजकल होशियारी कहते हैं!!!

दिल के मंदिरों में कहीं बंदगी नहीं करते, पत्थर की इमारतों में खुदा ढूंढ़ते हैं लोग ।

हवा गुजर गई पत्ते हिले भी नही वो मेरे शहर आए और हम मिले भी नही..!!

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