तौक़ीर अँधेरों की बढ़ा दी गई शायद... इक शम्अ जो रौशन थी बुझा दी गई शायद...

समझौते ही करने होते तो व्यापार करते ना समझ थोड़े ही है जो तुझसे प्यार करते

संघर्ष प्रकृति का निमंत्रण है, जो स्वीकार करता है वही आगे बढता है....

इक्का चाहे कितना भी उछलें.. हुकुमत तो बादशाह ही करता है..!!

ये जादू तेरे इश्क का, या मुझे नशा हो गया है, तेरे सिवा हर शख्स क्यू धुंधला सा हो गया है...!!!

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