कुछ ख़याल कुछ हक़ीक़त मिलाते हैं हम,
ऐसे ही पंक्तियों में ख़ुद को उतारते हैं हम।
मैं नहीं कहता मुझे औरों से बेहतर चाहिए
मुझ को जितनी है ज़रूरत उतनी चादर चाहिए
हैं परेशाँ इस लिए भी लोग अपनी प्यास से
प्यास की ख़ातिर सभी को इक समुंदर चाहिए
मुद्दतों भटके हैं मेरे ख़्वाब सारे दर-ब-दर...
तौक़ीर अँधेरों की बढ़ा दी गई शायद...
इक शम्अ जो रौशन थी बुझा दी गई शायद...
समझौते ही करने होते तो व्यापार करते
ना समझ थोड़े ही है जो तुझसे प्यार करते
संघर्ष प्रकृति का निमंत्रण है,
जो स्वीकार करता है वही आगे बढता है....