सोचता हूँ कुछ “क़िस्से” कहूँ फिर सोचता हूँ “किस से” कहूँ…

जंजीर बढ़ा कर साध मुझे, हाँ, हाँ दुर्योधन! बांध मुझे। रामधारी सिंह दिनकर

तुम्हे दाल के पकोड़े पसंद है लो फिर हम कौनसे कम है ☕

किसी की बाते बेमतलब सी, किसी की खामोशियां कहर है.

मुझको मजबूर न कीजिएगा अदाकारी पर , मैं जो किरदार में उतरा तो क़यामत होगी ..!!

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