हर कोई माँ की मोहब्बत की बात करता है , लेकिन बाप की कुरबानियों का जिक्र कोई नहीं करता है ...

कबीरा तेरे जगत की है कैसी ये तकदीर जनता सारी सड़कों पर, बैठे महल फ़कीर

वफा के रश्मों रिवाजों को बहुत देखा जमाने में निभाने का हुनर तो बस किताबों में होता है.. प्रज्ञा शुक्ला

आगाह अपनी मौत से कोई बशर नहीं सामान सौ वर्ष का है पल की किसी को खबर नहीं!

गीत ग़ज़लों में शामिल गर ना हो सके, तो तुम्हारे दर्द में बसर हम ज़रूर करेंगे। नेहा यादव

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