इंसानियत की बातें सब करते हैं लेकिन गुस्से में आते ही भूल जाते हैं, वो इंसान हैं।

हिंसा और अज्ञानता के मकड़जाल को शिक्षा की छड़ी से साफ़ किया जा सकता है। कैलाश सत्यार्थी

इक रोज़ इक नदी के किनारे मिलेंगे हम, इक दूसरे से अपना पता पूछते हुए.

हमे देखो हमारे पास बैठो हमसे कुछ सीखो , हमने प्यार मांगा था हमने दाग़ पाए हैं...

थक चुका हूं जिंदगी को हिसाब देकर सिर्फ सूत उतारा है अभी मूल बाकी है

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