“मनुष्य का ह्रदय अभिलाषाओं का क्रीडा स्थल और कामनाओं का आवास है” मुंशी प्रेमचंद

माटी कहै कुम्हार से, तू क्या रौंदे मोय। इक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूगीं तोय॥ कबीरदास

सिर्फ सांत्वना स्वीकार नही, इस बार पूरी तरह से न्याय चाहिए। हैवानो की सजा के साथ - साथ, हर नजर में पुराना सम्मान चाहिए। सेजल

मैं मरना पसंद करूंगा मगर गूंगा बहरा बन कर रहना नहीं

आँख के अंधे को दुनिया नहीं दिखती, काम के अंधे को विवेक नहीं दिखता, मद के अंधे को अपने से श्रेष्ठ नहीं दिखता, और स्वार्थी को कहीं भी दोष नहीं दिखता। चाणक्य

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