कैसे हो पायेगी अच्छे इंसान की पहचान , दोनो ही नकली हो गए है आँसू और मुस्कान …

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥ परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् । धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे

हम मान ही नहीं सकते की पुरूषों की भीड़ ने दो स्त्रियों को निवस्त्र कर दिया, काश!..वहाँ एक भी पुरुष होता.

जैसे जैसे दुनियां समझ में आती हैविश्वास शब्द खोखला लगने लगता है !

गिद्धों कि तरह नोचा है अस्मत भी उनकी लूटी है, इस देश में यत्र नार्यस्तु पूज्यंते कि सारी रस्में झूठी हैं, और राम करे रक्षा सीता की, कृष्ण द्रौपदी का चीर बढ़ाते हैं, कलयुग के हैं देव विलुप्त इसलिए सब "नं'गा नाच" कराते...

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