गांव की मिट्टी में पले बढ़े है, हमें अदाएं कम मर्यादाएं ज्यादा पसन्द हैं।

शतरंज सी जिन्दगी में कौन किसका मोहरा है आदमी एक है मगर सबका किरदार दोहरा है

आज के ज़माने के शुभचिंतक ऐसे होते जा रहे हैं, जो आपका शुभ होते चिंतित हो जाते हैं!

जिसकी सबसे दोस्ती होती है, अक्सर वो किसी के नहीं होते...

रेल की तरह गुजर तो कोई भी सकता है... इंतजार में पटरी की तरह पड़े रहना ही असली इश्क है..!!

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