अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपाएं कैसे तेरी मर्ज़ी के मुताबिक़ नज़र आएँ कैसे।

चार दिन की ज़िन्दगी में किससे क़तरा के चलूँ" "ख़ाक हूँ मैं ख़ाक पर क्या ख़ाक इतरा के चलूँ"

लोग इंतजार में थे मुझे टूटा हुआ देखने को, एक मैं था जो सहते सहते पत्थर का हो गया।

हैरत इसपर नहीं कि धर्म का धंधा हो रहा है , हैरत इसपर है पढ़ा लिखा भी अंधा हो रहा है !

लड़े जो अंदर से बिखरकर ,कड़वी बात सुनकर डटे रहना। मौन होकर ही सही, पर मित्र के साथ हर पल खड़े रहना।। सेजल

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