चिंता से चतुराई घटे, दु:ख से घटे शरीर। पाप से लक्ष्‍मी घटे, कह गये दास कबीर।। कबीर

वैसे तो बहुत से लोग मुझे जानते नहीं फिर भी बता दूँ मैं वही बर्बाद शख़्स हूँ अश्विनी यादव

कोई भी नशा आदमी के लालच से बड़ा नहीं होता! मदन कश्यप

अभी माचिस है तेरे हाथ में , तू जितने चाहे घर जला ! पर हवा के मिज़ाज से खौफ़ खा , कहीं तेरा घर भी न दे जला !!

रंग बदलती इस दुनिया में... मुझे अपने बेरंग होने से...शिकायत न रही....

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