ख़ुद से ही भाग रही हूँ
क्या ढूँढ रही हूँ मालूम नहीं
क्या पाना है जानती नहीं
भटक रही हूँ एक न ख़त्म होने वाले सफ़र में
चल रही हूँ इन काँटों से भरे रास्तों पे
न कोई ख़ुशी है...
कमाने वाले को पता होता है पैसे कैसे कमाए जाते हैं,
बैठके खाने वाले लोग हाथ का मैल कह देते हैं।
अनवर चतुर्वेदी
मित्रता बड़ा अनमोल रतन
कब उसे तोल सकता है धन?
धरती की तो है क्या बिसात?
आ जाय अगर बैकुंठ हाथ
उसको भी न्योछावर कर दूँ,
कुरूपति के चरणों में धर दूँ।
सिर लिए स्कंध पर चलता हूँ,
उस दिन के लिए मचलता हूँ,
यदि चले वज्र दुर्योधन...
अदब की बात है वरना मुनीर सोचो तो
जो शख़्स सुनता है वो बोल भी तो सकता है
मुनीर नियाज़ी
हम महानता के सबसे करीब तब आते हैं जब हम विनम्रता में महान होते हैं।
रबीन्द्रनाथ टैगोर