मेरे शब्दों का ज़िम्मेदार हूं मैं, आपकी सोच का नहीं

अपना हुस्न संभाल कर रखो मैं इस‌ हुस्न पर दुपट्टा डालूंगा

आग अपने ही लगा सकते हैं ग़ैर तो सिर्फ़ हवा देते हैं! — मोहम्मद अल्वी

तुम्हारी ख़ातिर तो बदला मैंने खुद को। फिर तुम....किसकी ख़ातिर बदल गए

मैं इसलिए ज़िंदा हूँ कि मैं बोल रहा हूँ दुनिया किसी गूँगे की कहानी नहीं लिखती अनवर जलालपुरी

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