वक्त भी कैसी पहेली दे गया
उलझने सौ और जान अकेली दे गया
ज्यादा अच्छे मत बनो
अच्छे से इस्तेमाल कर लिए जाओगे !
काश हमारे प्यार की नैया भी कबूतर पार लगाता,
तुम्हारा पैगाम अपने पैरो से मुझ तक पहुंचाता,
ख्वाब सात जन्मो के हम भी देख लेते तुम्हारे साथ,
अगर मुकद्दर को होता मंजूर तो तुमसे मिलवाता,
और हम भी महका देते कमरे को गुलाब के...
ये गंदगी तो महल वालो ने फैलाई है “साहिब”
वरना गरीब तो सङको से थैलीयाँ तक उठा लेते है !!
जाति सिर्फ दो ही है, स्त्री और पुरुष,
धर्म सिर्फ एक है इंसानियत बाकी सब पाखंड और धंधा है...