बोलने में मर्यादा मत छोड़ना, गालियाँ देना तो कायरों का काम हैं...

बाद तुम्हारे सब अपनो के मन माने बर्ताव रहे मुश्काने क्या आंसू क्या सालाना त्यौहार हुए

नेता गरीबों कि बैसाखी के सहारे खुद के सिर पर ताज चाहते हैं, कहलाते गरीबों के मसीहा हैं और उन्हीं को पैरों तले दबाते हैं..!! विरक्ति

सही वक्त पर करवा देंगे हदों का एहसास, कुछ तालाब खुद के समंदर समझ बैठे हैं...

लगता है मेरे अच्छे दिन रास्ता भटक गए हैं.. पता नहीं क्यों आ ही नहीं रहें...!!

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