मैं सागर से भी गहरा हूॅं तुम कितने कंकड़ फेंकोगे।

तुझे अल्फाजों में लिखते-लिखते यूँ ही ज़िंदगी की शाम हो जाये, बस रहे तू ही आबाद मेरे लफ्ज़ो में, चाहे ये जिंदगी नीलाम हो जाये...!!

"माँ थी अनपढ़ लेकिन उसके पास गीतों की कमी नहीं थी कई बार नये गीत भी सुनाती रही होगी एक अनाम ग्राम-कवि" आलोक धनवा

कर्म अगर अच्छा है तेरा क़िस्मत तेरी दासी है दिल है तेरा साफ़ तो प्यारे घर में मथुरा काशी है! गोपालदास नीरज

दाँव पर सब कुछ लगा है, रुक नहीं सकते टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते अटल बिहारी वाजपेयी

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