मुझे अपने रिश्तेदारों से उतना ही डर लगता है, जितना किसी शादीशुदा को अपने बीबी से

नैनों में था रास्ता हृदय में था गाँव हुई न पूरी यात्रा छलनी हो गए पाँव

धुँधले ज़मीर गिरगिट फितरत काली, गोरी ,साँवली नीयत.... अपने-अपने रंगों पर सबकी पहरेदारी है...!!

व्यापार या व्यवहार उन लोगों से रखो जिनकी जान से ज्यादा जुबान कीमती हो..

गाँव को छोड़ के हम शहर कमाने आए अब ये एहसास हुआ जान गँवाने आए!

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