हम तो समझे थे कि इक ज़ख़्म है भर जाएगा क्या ख़बर थी कि रग-ए-जाँ में उतर जाएगा

मेरे पास से जो गुजरा, मेरा हाल तक ना पूछा मैं कैसे मान जाऊँ कि वो दूर जाके रोया परवीन शाकिर

ये दुख नहीं के अँधेरों से सुलह की हमने, मलाल ये है के अब सुबह की तलब भी नहीं…

ख़्वाहिश ये नहीं कि वो लौट आए मेरे पास, तमन्ना ये है कि उसे जाने का मलाल हो...

इश्क सीमित नहीं इंसान तक , चाय के भी तो आशिक होते है ।।

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