हम पहुंचेंगे हर घर तक, न्याय का हक़, मिलने तक! गली, मोहल्ला, संसद तक न्याय का हक़, मिलने तक! सहो मत...डरो मत!

उठते हुए तूफ़ान का मंज़र नहीं देखा देखो मुझे गर तुम ने समुंदर नहीं देखा

मूर्खो से तारीफ सुनने से बेहतर है, कि बुद्धिमान से तुम डांट सुन लेना..!!

रोटी कमाने की फिक्र, रोटी खाने भी नहीं देती...

आजकल कामयाब वही हैं, जिसके बाप-दादा सड़क किनारें जमीन छोड़ कर गए हैं।

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