शिकार है मासूमियत गरीबी की, फिर भी चेहरे पर मुस्कान है, रूपयों का मोह नहीं उसे, बस दो निवाले में बसती उसकी जान है

पिता वो दुआ है जो हर किसी के हिस्से नहीं आती। जिसके आती है उसकी कोई ख़्वाहिश अधूरी नहीं रहती।।

सफलता चाहिए तो खुद को बस में रखो ,दूसरों को नहीं !

मजबूत हूं लेकिन फिर भी टूट जाता हूं मुझे अपनों का अजनबी लहजा बहुत तकलीफ देता है

रोचक रहस्य बनकर रहना सदा, संसार समझ जाएगा तो व्यक्तित्व इस्तेमाल किया जाएगा....!!!!

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