20

Jun

जितनी शिद्दत से तुझे चाहा था

तूझे भूलने में उतनी ही ज़हमत उठानी पड़ रही है..

तुमने तोड़ा है इतने टुकड़ों में मुझे तुम क्या जानो खुद को समेटने में कितनी मशक्कत उठानी पड़ रही है..

ना रातों को चैन है ना दिन को सुकून

तुम क्या जानो मेरे मन को जीने में कितनी जिल्लत उठानी पड़ रही है..!!

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