29

Oct

एक हंसता खेलता 
आंगन मेरा भी था 
बलखाती इठलाती 
रौनक ऐ जहां मेरी भी थी

पैरों के नीचे जन्नत 
कहलवाने वाली माँ भी थी
एक कमजोर सा 
बाप का साया था 
जो मेरी हर जरूरत में 
काम आया था
एक गौरैया दो बोलते तोते भी थे 
जो रोज चीं चीं करती थे
चन्द कागज के टुकड़ों ने 
सबसे दूर कर दिया ,,,,

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