9

Aug

ख़ुद से ही भाग रही हूँ 
क्या ढूँढ रही हूँ मालूम नहीं 
क्या पाना है जानती नहीं 
भटक रही हूँ एक न ख़त्म होने वाले सफ़र में 
चल रही हूँ इन काँटों से भरे रास्तों पे 

न कोई ख़ुशी है न कोई ग़म 
एहसास विहीन बन बस चलती जा रही हूँ 

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