एक बार ही बहकती है ये नज़रेकिसी को देख कर….ये इश्क है साहेब सौ बार नहीं होता …

खामोशियां कर दे बयां तो यह अलग सी बात है वरना कुछ अल्फाज लफ्जों में बयां नहीं होते

नाराज़ हो जाते हैं अब वो साहब जब जवाब हम उन्हें उनके ही लहज़े में देते हैं

क्यूँ न आए दुआओं 🤲 पर यकीन.गिरते गिरते सम्भल जो गया हूं मैं..!!

पीठ से निकले खंजरों को जब गिना मैने..।ठीक उतने ही निकले जितनों को गले लगाया था मैने..!!

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