अखबार सी हों गई है जिंदगी हर रोज़ नई ख़बर

लग गई आग उन मकानों में जिन मकानों में कभी रहते थे, आपसे और क्या कहें साहिब कल भी रोते थे अब भी रोते हैं।

इजहारे ऐ इश्क महफिल में आंखों ही आंखों में बयां हो रहाकैसे बचाते दिल को जब #कातिल से ही इश्क हो रहा था !!

हम खाली किताब थेलोग आते गए सबक छपता गया

कितनी भी जान छिड़क लो… बदलने वाले बदल ही जाते हैं!!!

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