बेवजह बेमतलब की ही ये सारी तकरार हैकिनारे लड़ रहे हैं सब, जाना दरिया पार है।

जब शिकार का वक्त आएगातब, हम जंगल मे जरूर आएंगे..

जज्बातों का भी बाजार थाये जरा तब समझ आया ,एक रोज हम वहां चले गए ,जहां ये शामें लगा करती थी।।

जमाने में निकल कर देखी हिंदू मुस्लिम की जलन,लहू में लथपथ हो गयी इंसानियत लिखते हुए कलम.

और तो कौन है जो मुझको तसल्ली देताहाथ रख देती हैं दिल पर तेरी बातें अक्सर..!!

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