प्रकृति ईश्वर की सुंदर रचना है,जिसे उन्होंने हमें एक अनमोल उपहार केरूप में आशीर्वाद दिया है !

मैं कितनी भी कोशिश कर लूअपनी शायरी में प्यार के रंग नहीं उड़ेल पाती मेरेशब्दोंमें अक्सर जिक्र होता है रुसवाई, बेवफाई,बेरुखी,बेचैनी,आँसूक्योंकि आज तकमुझे तुमसे यही सब मिला हैइश्क क्या होता है?कभी जान ही नहीं पाईजो तुमसे आजतक नही मिलाशायद वही इश्क था

अक्सर, पिताओं के गुज़र जाने के बाद ही हम उनसे प्यार करना सुरु करते हैं.

तहज़ीब, अदब और सलीका भी तो कुछ है, झुका हुआ हर शख़्स बेचारा नहीं होता….

किसी मंदिर के बाहर लिखा था बेझिझक भीतर चले आइये…." पाप " करके आप थक गए होंगे ?मगर….." माफ़ " करके मैं नहीं थका.।।

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