गलती हो या के न हो गर्दन झुका के देखो खामोश रह के अपना रिश्ता बचा के देखो अल्फाज़ खार भी हैं, तलवार भी, जखम भी अपनी ज़ुबान को पर मरहम बना के देखो

अजनबी बने रहने में सुकून हैये जान पहचान वाले जान ले लेते है

परिवार और समाज दोनों ही बर्बाद होने लगते हैंजब समझदार मौन और नासमझ बोलने लगते हैं।

आप बस किरदार हैं अपनी हदें पहचानिएवरना फिर एक दिन कहानी से निकाले जाएंगे

हम खड़े वहां होते हैं जहां बैठने को जगह नही होती...

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