जीवन निर्णय नहीं निरंतर भय है।

तू जहां तक दिखाई देता है.. उसके आगे मैं देखता ही नहीं..

हर बार न जाने क्यों अगर मगर में उलझ जाते हैं जो कहना होता है उनसे वो कह नही पाते हैं

" ऐब " भी बहुत है मुझमे , और " खूबियां " भी , ढूँढने वाले तू सोंच , तुझे क्या चाहिये मुझमे ..!!

तुम लाख कोशिश कर लो इस्लाम का नामोनिशान मिटाने की, लेकिन हकीकत यही है जुगनूओं के समूह से कभी जंगल नहीं जला करते।

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