मैं आज भी अपने मुकद्दर से शर्त लगाती हूं... भरी बरसात में कागज की पतंग उड़ाती हूं...!!

जिसके लिए सीखा था चाय बनाना अब वो हमसे बहाने बनाती है

किसी ग़लतफ़हमी में मत रहना, तुम्हारी कमी किसी को उदास, रखेगी ये सोच कर वक़्त.. जायज़ मत करना !!!

इंसान की अकड़ वाजिब है जनाब, पैसा होने पर तो बटुआ भी फूल जाता है !!

इतनी शिकायत, इतनी शर्तें, इतनी पाबन्दी तुम मोहब्बत कर रहे हो या एहसान?

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