मित्रता बड़ा अनमोल रतन कब उसे तोल सकता है धन? धरती की तो है क्या बिसात? आ जाय अगर बैकुंठ हाथ उसको भी न्योछावर कर दूँ, कुरूपति के चरणों में धर दूँ। सिर लिए स्कंध पर चलता हूँ, उस दिन के लिए मचलता हूँ, यदि चले वज्र दुर्योधन...

अदब की बात है वरना मुनीर सोचो तो जो शख़्स सुनता है वो बोल भी तो सकता है मुनीर नियाज़ी

हम महानता के सबसे करीब तब आते हैं जब हम विनम्रता में महान होते हैं। रबीन्द्रनाथ टैगोर

हाथ भी नहीं मिलाते उन लोगों के साथ जिनकी रूह से हमें गद्दारी की बदबू आती है।

रास आ जायेगा एक रोज़ तेरा जाना भी , हम किसी दुःख में लगातार नहीं रोते हैं ।।

Translate »