ये दबदबा, ये हुकूमत, ये नशा, ये दौलतें, सब किरायेदार हैं, घर बदलते रहते हैं...!!

मन का झुकना भी बहुत जरूरी है, सिर्फ तन झुकाने से भगवान नहीं मिलते.....

बदल गए हैं मायने अब रिश्तों के.. अब हर रिश्ते का मतलब, सिर्फ़ "मतलब" है..

दुर्घटना तो जन्म है मृत्यु तो घटना का अंत है

न्यायार्थ अपने बन्धु को भी दण्ड देना धर्म है। मैथिलीशरण गुप्त

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