जब तक सब अपने थे ज़िन्दगी साथ गुज़ारी है, धीरे धीरे सब बदल गयें,अब हमारी बारी है।

एक नफरत ही है जिसे दुनिया चंद लम्हो मे जान लेती है वरना चाहत का यकीन दिलाने मे तो जिंदगी बित जाती है

पवर पहचान बना सकती है सम्मान चाहिए तो कर्म करो।

किताब के पन्ने की तरह मोडे गए फिर ना कभी खोले गए ना पढ़े गए

हमारा चरित्र कितना ही दृढ़ हो, पर उस पर संगति का असर अवश्य होता है।" प्रेमचन्द

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