साधू भूखा भाव का, धन का भूखा नाहिं, धन का भूखा जी फिरै, सो तो साधू नाहिं। कबीरदास

तुम्हारा एकांत ही तुम्हें मनुष्य बना सकता है, भीड़ तुम्हें भेड़ बना देगी। जया मिश्रा

धागे बहुत कमज़ोर चुन लेते हैं हम, और फिर सारी उम्र गाठ बांधने में गुज़र जाती है...

मैं सागर से भी गहरा हूॅं तुम कितने कंकड़ फेंकोगे।

तुझे अल्फाजों में लिखते-लिखते यूँ ही ज़िंदगी की शाम हो जाये, बस रहे तू ही आबाद मेरे लफ्ज़ो में, चाहे ये जिंदगी नीलाम हो जाये...!!

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