वतन के जाँ-निसार हैं वतन के काम आएँगे, हम इस ज़मीं को एक रोज़ आसमाँ बनाएँगे!

धन दौलत को चाहने वाला बिखर जाता है, और महादेव को चाहने वाला निखर जाता है !

सागर की अपनी क्षमता है पर माँझी भी कब थकता है जब तक साँसों में स्पन्दन है उसका हाथ नहीं रुकता है

सिर्फ तुम हो मेरे सुकून का लम्हा वरना शोर तो सारे जहां में है.....

गुरुर नही हम खुद पर नाज करते है, जो जैसे मिलता है , हम वैसे बात करते है...!!

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