मैं तुम्हारे मिज़ाज के मुताबिक नहीं हूँ, हाँ कड़वा ज़रूर हूँ मगर मुनाफिक नहीं हूँ..

आज शाम सजेगी वो दुल्हन सी, उसका साजन आज फिर से छत पर आएगा.... अपने हाथों से पिलाकर पानी, वो आज फिर मेरी मोहब्बत को गले लगाएगा..!!

अजीब अदा है लोगों की ... नजरें भी हम पर और नाराजगी भी हमीं से...!

दुनिया तुली थी हमको बनाने पे देवता , पर हम किसी भी हाल में पत्थर नहीं हुए

जहां साधारण लोगों की हिम्मत टूट जाती है, वहीं से इतिहास रचने वाले शुरुआत करते हैं

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