अरे नफरत नहीं थी मुझे इश्क़ से, हम भी कभी मुरीद थे उसके, जब देखा उसे गैर कि बाहों में तब जाना सिर्फ मरीज़ थे उसके..!!

आंखों में स्वार्थ की पट्टी बंधी हुई है, रिश्ते अब गोरख धंधा हैं, ईर्ष्या को मनुष्य गले लगाकर, केवल दौलत के पीछे अंधा है..!!

ये ज़िन्दगी इतनी भी आसान नहीं, जितनी हम समझ रहे थे, इश्क़, समझौते और जिम्मेदारियों के तजुर्बे रोज़ मिल रहे थे..!!

फकीरों की सोहबत में बैठा कीजिए साहब!! बादशाही का अंदाज खुद ब खुद आ जाएगा...

चार दिन आंखों में नमी होगी, मैं मर भी जाऊं तो क्या कमी होगी ?

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