मैं तुम्हारे प्रेम का पूर्ण विराम बनना चाहता हूं... प्रथम नहीं, प्रेम पथ का अंतिम विश्राम चाहता हूं.

जब डूब रही थी कश्ती और दूर था किनारा, तब भी भरोसा सिर्फ खुद पर था हमारा....

अंगड़ाई पर अंगड़ाई लेती है रात जुदाई की... तुम क्या समझो तुम क्या जानो बात मिरी तन्हाई की...

घर की जिम्मेदारियों से जब दब जाओगे, क्या असर करती है चाय समझ जाओगे।

सोचती हूँ लिख दूं एक किताब खुद के संघर्षों पर , फिर आता है ख्याल की पढ़ेगा कौन ....

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