दो रोटी के वास्ते, मरता था जो रोज । मरने पर उसके हुआ, देशी घी का भोज ॥

कुछ ग़लत पते, हमें आजीवन के यात्री बना देते है।

मेरे हिस्से में भी ये दिन आए.... हथेली मेरी हो और अपने नाम की मेहंदी तू लगाए !

तेरा तुझ को अर्पण.. क्या लागे मेरा..

कितना ख़ास बनाया था हमें ईश्वर ने हम कितने आम बन गए हैं मशीनों से ग़ुलामी कराते कराते मशीनों के ग़ुलाम बन गए हैं

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